फिल्मी दुनिया
सैयारा
न जाने क्या सोच के सोचा.. कि चलो सोचें क्यों, बस देख ही ली जाए यह मूवी!
देखने पर लगा कि या तो हम जनरेशन गैप का शिकार हो चुके हैं, या फिर लॉजिक ढूंढते-ढूंढते 'पिच्चर' के असली मज़े को कहीं खो देते हैं।
पर लाख दार्शनिक बनकर दिल को समझाया जो कुछ कुछ होता है से लेकर दिल तो पागल है तक के हर लॉजिक को झेल गया पर न जाने क्यों सैयारा में... हीरो से लेकर हीरोइन की हर बात पर लॉजिक के सिर पैर ढूंढते रहे!
हमारा यह वही दिल है, जिसने कभी खुशी कभी गम पिच्चर में... ऐसी जगह जहाँ हेलीकॉप्टर आकर लैंड हो रहा है, पीछे स्विट्जरलैंड और न्यूजीलैंड टाइप मौसम है और हीरो भागकर उस बड़े से बंगले में घुस रहा है...और वो जगह दिल्ली के चांदनी चौक से वॉकिंग डिस्टेंस पर हैं...यह लॉजिक का अ-फीमची घूँट भी पी लिया!
लेकिन, किन्तु-परन्तु हम सैयारा का घूँट नहीं पी पाए
एक्स्ट्रा सॉल्टेड इमोशन था...इतना कि यह समझ न आया कि पॉपकॉर्न में नमक ज़्यादा था, या थियेटर में बैठे रोहिल्ला साहब के आँसू हमारे पॉपकॉर्न में कूद गए !
पड़ोस में बैठ के कोई फिल्म के हर सीन पर आँसू बहा रहा था, तो किसी के खर्राटों की आवाज़ से दिल दहल रहा था।
कहानी कम, क्लोज़-अप ज़्यादा।
भावनाएँ इतनी परोसी गईं कि डायलॉग्स डूब गए। इमोशनल वेव में लॉजिक बह गया। जो रोना चाहें, उनके लिए परफेक्ट।
बाकियों के लिए एक नमकीन अनुभव!
मेरे हिसाब से तो भावनाओं का ओवरडोज थी #सैयारा
