तीसरा पन्ना
परवरिश
सीमा रुचि को यूनिवर्सिटी छोड़ने दिल्ली आयी थी। बस स्टैंड से मैट्रो , मैट्रो से यूनिवर्सिटी जाते हुए उसने जो कुछ देखा उससे वो असहज भी हो उठी थी और परेशान भी। जगह जगह लड़के लड़कियां एक दूसरे का हाथ पकड़ , जोड़ियां बनाकर घूम रहे थे।
कहीं कहीं तो मर्यादा की भी धज्जियां उड़ायी जा रहीं थी। लड़कियों का पहनावा ऐसा , कि लगता था शायद अभी कुछ और भी पहनना बाकी था जो वो भूल गयी हैं । सीमा हैरान थी कि क्या ये लड़कियां अपने माँ बाप के सामने से ऐसे ही आती होंगी। एकाध जगह तो उसका जी चाहा कि जाकर चपत रसीद कर दे।
बेसाख्ता उसने रुचि से कहा, " हद है, देखो तो क्या पहना है। समझ नहीं आता दिखाने के लिए पहना है या छुपाने के लिए। बुरे हाल हैं लड़के लड़कियों दोनों के। जी तो चाहता है कि ..."।
रुचि ने मुस्कुराते हुए उसकी बात बीच में ही काट दी। "सच में मम्मा , पता नहीं कैसे पहन लेती हैं ये सब ये लड़कियां और कैसे ये लड़कों को इतना फ्रीडम दे देती हैं कि वो उनसे जैसे मर्ज़ी टच करके बात करते हैं।
एक डिस्टेंस तो होना ही चाहिए ।सच कहूं मम्मा ,आजकल जो इतने हादसे होते हैं, वो दुखद तो हैं लेकिन कहीं ना कहीं कुछ हादसों में तो ज़िम्मेदारी हम लड़कियों की भी है।" सीमा ने हर्षमिश्रित हैरानी के साथ रुचि की ओर देखा क्योंकि आजकल के बच्चे ज्यादातर अपनी जनरेशन की हर सही-गलत बात की पैरवी ही करते हैं।
एक राहत भरी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गयी। रुचि ने आगे कहा," मैं जानती हूं मम्मी ,आप क्या सोच रही हो।आप बिल्कुल टेंशन ना लो।" जिस दृढ़ता के साथ रुचि ने ये कहा था उससे सीमा की पेशानी पर आए चिंता के बादल छंट चुके थे।
उसे विश्वास था कि उसके दिए संस्कारों की जड़ें इतनी मज़बूत हैं कि दिखावे की आंधियां इसे नहीं हिला सकती। उसके साथ ना होने पर भी उसकी परवरिश रुचि को भटकने नहीं देगी।अब वो निश्चिंत होकर वापस जा सकती थी।
