दूसरा पन्ना
रीना (एक सांवली लड़की )
कुछ साल पहले की बात है जब मैंने नए स्कूल में नया नया एडमिशन लिया था। जहां मैं किसी को नहीं जानता था मेरे लिए वहां हर चेहरा नया था। क्लास में लगभग तीस के आस पास स्टूडेंट्स थे। वैसे तो सब एक दूसरे के दोस्त थे लेकिन सब की अपनी कहानी थी।
उन सब में से एक लड़की थी रीना जो कि थोड़ी सांवली थी। दिन प्रतिदिन मैंने उसके बारे में वहां सिर्फ ग़लत ही सुना था। लगभग सभी ये कहते थे कि ये बहुत बेकार है देख कितनी काली दिखती है कितना एटिट्यूड दिखाती है कुछ लड़कियां भी थी जो ऐसा कहती थी उसके फेस पर तो नहीं लेकिन पीठ पीछे बहुत कुछ कहती। और कहीं ना कहीं मुझे भी ऐसा ही लगने लगा था। हालांकि उसे पता भी होता था कौन उसके बारे में क्या बोल रहा है मगर वो ज्यादातर चुप ही रहना पसंद करती थी।
लेकिन धीरे-धीरे उसकी तरफ मेरा नजरिया बदलने लगा। क्योंकि दो तीन बार मेरे ऐसा हुआ कि मजबूर हो गया मैं। पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से मुझे हर रोज मार पड़ती। कई बार ऐसा होता कि कुछ होशियार लड़कियों से बोल दिया जाता था कि तुम इनसे प्रश्न पूछ लो और जिसको न आएं उसे खड़ा कर देना।
जब वो सुनती और किसी को कुछ याद ना होता तो ये कहकर बिठा देती थी कि बैठकर याद कर लो बस मुंडी ऊपर मत करना।
जो जो उस पर सवाल उठाते थे मुझे ऐसा लगा मानो उसका व्यवहार मुझे उन सब का जवाब दें रहा हों पता नहीं क्यों मैं उसके बारे में कुछ ज्यादा ही सोचने लगा खुद से ही सवाल करने लगा और ज़वाब देने लगा। वो जैसी दिखती है वैसी नहीं है मगर वो उन सब कुछ कहती क्यूं नहीं है।
सब उसे रंग से जज क्यूं कर रहे है अन्दर से क्यूं नहीं देखते कि वो कितनी खूबसूरत है इतनी हसीं कि जैसे चारों तरफ़ फूलों की क्यारी हो साफ़ पानी की नदी बह रही हो ठंडी हवा का झोंका कानों पर कुछ मीठी बातें कर कह रहा कि मुझे एक बार महसूस करके देखो तुम खुद ही पता चल जाएगा मैं क्या हूं।
कभी कभी लगता कि वो आने वाले कल में सबको जवाब देना चाहतीं हों। वो आईपीएस अधिकारी या कोई अध्यापिका बनना चाहतीं हों। कभी कभी लगता कि वो जब उदास होती होगी तो क्या सोचती होगी कोई उसे नहीं समझता वो इस धरती पर सिर्फ एक बोझ है उसकी भी फीलिंग्स है।
और कभी लगता कि वो बिंदास रहती है दुनिया उसके बारे में क्या सोचती है उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
कभी कभी लगता कि जो दिल में है उसे बोल देता हूं मगर कहीं ना कहीं एक अंजाना सा डर लगा रहता कि वो क्या सोचेगी। वो कहते है ना कि जो हम लिख कर बयां कर सकते है वो सामने आकर कभी नहीं बोल पाते और यही सोच कर मैंने अपनी पहली कविता लिखी सांवली सी लड़की फिर दूूूूसरी गुनाह किया क्या फ़िर तुम मेरे लिए खास हो , तुमसे कुछ कहना है धीरे धीरे अपने दिल की बाातोंं को लफ़्ज़ों में उतारता चला गया। और आज काफ़ी हद तक मैं लिखना सीख गया।
