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जिन्दगी एक डायरी

खुद से नाराज़गी

बहुत नाराज़ हूं खुद से आज मालूम नहीं किन किन बातों पर
आज खुद का वजूद खोता नजर आ रहा है मन कर रहा है कि एक जोर का तमाचा मार लूं खुद को और फिर घंटो रोऊं बैठकर किसी कोने में..जहां किसी की नजर ना पड़े मुझपर...

खो जाऊं खुद में ही और खुद को सजा दूं उन तमाम गलतियों की जो ना चाहते हुए भी मुझसे हुई हैं।
माफी मांग लूं उन सभी से जिनकी आंखे मेरी वजह से रोई हैं।

आज थक सा गया हूं खुद को संभालते संभालते मुश्किल  लगता है आगे का सफर।
कुछ समझ नहीं आता कि क्या करूं कहां जाऊं किससे कहूं वो सब जो मेरे नजरिए से सही है और किसी और के नजरिए से गलत।

किसे समझाऊं बैठाकर अपने सामने कि कभी मेरी जगह खुद को रख के दुनिया की तरफ देखों
नहीं समझ आता कैसे अपने शब्दों को पेश करूं कि कोई उसके मायने को तो समझ सके।
आखिर में निराश हताश होने के सिवा कुछ बचता भी नहीं और मन फिर खुद से नाराज़ सा हो जाता है।