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जिन्दगी एक डायरी

मंडोर गार्डन

मैं (मोहित) और रमेश जोधपुर के लिए 12 सितंबर 2022 को दोपहर दो बजे घर से रवाना हुए क्योंकि 3 बजे हमारी हिसार से ट्रेन थी। दरअसल 13 सितंबर को तीसरी सिफ्ट में मेरा रेलवे का पेपर था इसलिए हमें एक दिन पहले ही निकलना पड़ा। हम जोधपुर तकरीबन रात 11 बजे पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद हमने कमरें की तलाश की काफी मस्क़त के बाद आखिरकार हमें कमरा मिल ही गया। 

अगले दिन सुबह  एक बार को तो मन हुआ कि घंटाघर और बाजार घूमा जाये पर फिर सोचा कि यहां पर तो पेपर के बाद भी घूमा जा सकता है तो फिर हमारा प्लैन बना कि हम मंडोर गार्डन देखने चलेंगे ।

मंडौर के लिये यहीं से बस मिल गयी और उसने 20 रूपये में मंडौर पहुंचा दिया मंडौर गार्डन में घुसने से पहले बाहर गेट पर आइसक्रीम खायी और पानी की एक बोतल ले ली उसके बाद अंदर प्रवेश किया और काफी दूर चलने के बाद करीब 500 मीटर सीधे हाथ पर काफी सारे मंदिरो का समूह आया।

इन मंदिरों के समूह में सारे मंदिर एक ही शैली के थे और एक जैसे ही दिखते थे। यहीं पर पास में काफी सारी छ​तरियां बनी हुई थी जहां तेरे नाम फिल्म के एक गाने की भी शूटिंग हुई थी।

 मंदिरों को देखते देखते पास ही में बज रहे गाने पर बहुत देर से नजर थी। पास जाकर देखा तो पता चला कि यहां पर एक एडवेंचर पार्क भी बना दिया गया है। उसमें झूले आदि हैं और खाने पीने का इंतजाम भी है जिसके लिये टिकट लेकर जाना पडता है। यहीं पर मंदिरों के पास चार पांच पुलिस वाले भी बैठे हुए थे। 

सारे मंडौर गार्डन में जिनकी डयूटी होगी वे सब मेरे हिसाब से यहीं पर बैठे हुए थे शुरूआत में काफी भीड़ थी  कुछ लोगों ने तो इसे ताश खेलने की जगह बना रखा था लोकल लोग इस जगह को पिकनिक के रूप में ज्यादा इस्तेमाल करते होंगे मंदिरों के समूह से आगे चलते रहने पर आगे चढाई आयी और उसे चढने के बाद एक मंदिर आया इस मंदिर की शायद काफी मान्यता है और यहां पर प्रसाद की दुकान भी लगी हुई थी।

यहां से एक रास्ता पहाड़ी के उपर जा रहा था और दूसरा रास्ता एक अन्य झील के पार होकर वहां से दूसरी दिशा में पहाड़ी के उपर जा रहा था हमनें झील वाला रास्ता चुना झील के किनारे एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था पर वहां तक जाने की जहमत हमनें नही उठायी झील पर एक छोटा सा तीन फुट के करीब का रास्ता बना हुआ था और इस रास्ते पर आगे जाकर एक कब्र बनाकर अतिक्रमण किया हुआ था।

 हमनें इसे नहीं देखा और यहां से उल्टे हाथ की ओर चलने के बाद पहाड़ी के शिखर पर माता दुर्गा का मंदिर आता है जो कि आज भी अच्छी हालत में है फिलहाल यहां पर पुजारी नहीं था पर मंदिर की हालत देखकर लग रहा था कि पूजा पाठ होता है। यहां के बाद एक अन्य पास की ही पहाडी पर मंदिर के भग्नावशेष बाकी थे।

 यहां से पूरे मंडौर का बढ़िया व्यू दिखता है यहां से हम वापस चल पड़े और नीचे मंदिर समूह के पास आकर थोड़ी देर आराम करने के लिये बैठ गए। वहां पर बैठी एक बूढ़ी औरत ने हमें बताया कि पहले इस जगह को मांडवपुर कहा जाता था पुराने समय मेें मारवाड़ की इस राजधानी को राव जोधा ने असुरों से रक्षित मानकर अपनी राजधानी जोधपुर में बना ली।

 ये किला और यहां के महल जो कि एक समय बड़े आबाद थे अब केवल उनके ज्यादातर खंडहर ही यहां पर बचे है इसे रावण का ससुराल भी कहा जाता है क्योंकि इसका नाम मंडौर रावण की पत्नी मंदोदरी के नाम से मिलता जुलता है।

उन्होंने बताया कि यहां पर होली के दूसरे दिन लगने वाला राव का मेला काफी प्रसिद्ध है यहां की सबसे मुख्य बात ये है कि इस परिसर में हिंदू मंदिरों के अलावा जैन मंदिर,वैष्णव मंदिर, शैली का बौद्ध रूप में होना और परिसर में कुछ मकबरों को भी एक साथ देखा जा सकता है लेकिन आज़ के वक्त में मंडोर भी एक पिकनिक स्थल या पार्क बनकर रह गया है जहां पर मंदिरों के होने के बावजूद हर धर्म के लोग यहां पर घूमने आते हैं।

 विभिन्न महाराजाओं की स्मृति में छतरियां बनी हुई है उपर पहाड़ों से आ रही पानी की धारा कई चरणों में बहती हुई नीचे की ओर आती है जहां पर उसमें फव्वारे आदि लगाकर सुंदर बनाया गया था पर अब देखभाल के अभाव में सब बेकार और बंद पड़े है पानी रूका हुआ है और पर्यटकों द्वारा फेंकी गयी पन्नियों और बोतलों से अटे पड़े है।