कोमल की शादी
हनीमून
"अब तो भैया भाभी को भी हनीमून पर जाना चाहिए" खाने की टेबल पर बैठी अदिति ने ये सबसे कहते हुए अपनी भाभी को देखा, जो बस महीने ढेड़ महीने पहले ही तो आई थी इस घर में बहू बनकर।
अदिति की हनीमून वाली बात सुनकर घर की बुज़ुर्ग दादी जो वहीं बैठी थी, अपनी आवाज़ में कड़कपन लातीं हुईं बोलीं "हमारे खानदान में ये सब चोचले नहीं होते हैं, आए बड़े हनीमून वाले"
दादी की कड़क आवाज़ से दुल्हन के दिल में एक निराशा आकर बैठ गयी, उसने भी तो ये सोंचा था कि वो हनीमून जाएगी, शादी से पहले अपनी सहेलियों के बीच हनीमून पर तो वो न जाने कितनी देर बात किया करती थी, कोई कहता कि "गोआ से अच्छी और कोई भी जगह नही होगी हनीमून के लिए, तो कोई सहेली कहती कि "गोआ को गोली मार मेरी सुन तो कुल्लु मनाली से बेहतर कोई जगह नही है यार" न जाने कोमल भी क्या क्या सोच लेती थी तब, कि वो भी इन्हीं जगहों में से किसी एक जगह तो ज़रूर जाएगी, अपने हनीमून के लिए"।
"कौन हनीमून की बात कर रहा है इस घर में" कमरे से बाहर आते हुए घर के मुखिया सूरज सिंह की आवाज़ आई तो सभी खाने की टेबल पर शांत हो गए, अदिति उनकी छोटी बेटी तो भूल ही गयी कि अभी उसने ही हनीमून की बात छेड़ दी थी।
टेबल पर सामने की एक कुर्सी पर बैठते हुए सूरज सिंह ने कहा "ये हनीमून वगैरह सब फ़िल्मी बातें होती हैं, शादी के बाद पति पत्नी परिवार के साथ रहें यही परंपरा सही है"।
उनके फैसले को सुनकर दुल्हन का मन थोड़ा सा और बैठ गया, एक पल को उसने सोचा तो था कि वो, समीर अपने पति से हनीमून की बात छेड़ेगी, इस सावन के मौसम में हनीमून एक सपने के पूरे हो जाने के जैसा होता मगर ससुर जी की बात सुनकर कोमल कुछ मायूस सी होकर खाना परोसती रह गई।
घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई तो कोमल दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी, समीर के आने का वक़्त था ये, पर पीछे से कोमल की सासु माँ ने आवाज़ देकर कहा "तुम रुको बहू, यहाँ खाना परोसो मैं दरवाजा खोलती हूँ"।
दरवाज़े पर समीर ही था, घर में आते ही उसने माँ के पैर छुए और अंदर चला आया, माँ ने उसे कहा "चलो बेटा तुम भी हाथ मुँह धोकर खाने के लिए आ जाओ"।
खाने की टेबल पर समीर के लिए कोमल ने खाना परोसा, समीर के पिता जी ने खाने पर काम की बात छेड़ी तो फिर कोई और बात हुई ही नही।
खाने के बाद बर्तन इकट्ठा कर रही कोमल को सासु माँ ने देखा, कोमल थोड़ी अपने आप में ही मायूस लगी तो उन्होंने कोमल के रसोईघर में आने पर कहा "तुम्हारा भी मन है हनीमून जाने का बहू"।
कोमल दो पल के लिए चोंक सी गयी, फिर उसने एक नज़र सासु माँ को देखा। सासु माँ समझ गयी थी कि कोमल का भी बहुत मन है। वो आगे बढ़कर कोमल से बोलीं "तेरे ससुर जी थोड़े सख़्त है लेकिन इस उम्र तक हर कोई ऐसा हो ही जाता है और तुम्हारी दादी उनकी फिक्र मत करो, वो ऐसे नही तो वैसे कोई न कोई बात तो उठाती ही रहेंगी"।
कोमल के गाल पर हाथ रखकर माँ ने जब ये कहा तो कोमल को बिल्कुल भी नही लगा कि वो अपने ससुराल में है, उसे अपनी सासु माँ पर बहुत प्यार आ राह था। सासु माँ ने कोमल की मदद करते वक़्त कहा "मैं कुछ करती हूँ, तुम फिक्र मत करो, बस समीर से बात करना, जानती हूँ अभी नई नई शादी हुई है, लेकिन पति है वो तुम्हारी नही सुनेगा तो किसकी सुनेगा, तुम उससे बात करना, घर को मैं देख लूँगी"।
कोमल ये सुनकर अपनी सासु माँ के गले लग गयी, कोमल ने कहा "माँ मुझे इस सावन का हमेशा से इंतज़ार था, इस बार इसे खास बना दीजिए" माँ ने उसे प्यार किया और कहा "जाओ अब सो जाओ कल के लिए मैंने कुछ सोंचा है"।
कोमल कमरे में आई तो देखा समीर लैपटॉप पर काम कर रहे थे, कोमल कुछ देर बस यूँही उसे देखती हुई खड़ी रही, समीर का ध्यान जब कोमल पर गया तो वो थोड़ा ठिठक सा गया पर समीर कोमल की इज़्ज़त करता था, कोमल एक अच्छे घर की बहुत संस्कारी लड़की थी, ठीक वैसी जैसी लड़की की उसने अपने जीवन में कल्पना की थी।
"तुम्हें कुछ चाहिए" समीर की आवाज़ सुनकर कोमल थोड़ा हिचकिचा सी गयी, फिर बोली "नही वो, मैं बस, आप का काम और कितनी देर में हो जाएगा"।
समीर ने लेपटॉप को बंद करते हुए कहा "तुम कहो क्या कहना है"
कोमल बेड के अगले हिस्से पर बैठ गयी, फिर बालकनी से बाहर के मौसम को देखती हुई बोली "आज खाने की टेबल पर अदिति ने हनीमून की बात छेड़ी थी, तो दादी और पापा ने तो मना कर दिया, आप क्या कहतें हैं"।
समीर कोमल को देखता रहा फिर बोला "कोमल सच तो ये है कि दादी और पापा थोड़े पुराने ख़यालात के हैं, उनके मना करने पर शायद मैं भी कुछ नही कर सकूँगा"।
अगले दिन,
नाश्ते के वक़्त कोमल की सासु माँ ने दादी से कहा "बा, कुछ दिनों पहले रमेश आया था, कह रहा था हरिद्वार जाने की इच्छा है तो बताओ, वो उसने अपनी गाड़ी ली है ना, अपनी ट्रेवेल एजेंसी के लिए, तो वही कह रहा था की सबसे पहले वो हरिद्वार जाएगा, आपके बारे में भी पूछ रहा था, अगर आप जाना चाहती हैं तो कहिये बा, हम सब भी चल देंगे"।
दादी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा "हाँ बहू कबसे तो कह रही थी मैं, अब मुझे हरिद्वार लें चलो, लेकिन तुम लोगों के पास वक़्त ही कहाँ है मेरे बारे में सोंचने का"।
इसपर दादी से घर के मुखिया सूरज सिंह बोले "क्या माँ, तुम भी राशन लेकर चढ़ जाती हो, अब बात हो गई न, कह दूँगा रमेश से कि हम सब हरिद्वार चलेंगे उसकी गाड़ी से"।
कोमल किचन से सब सुन रही थी, अदिति भी अपने कमरे से आई तो हरिद्वार जाने की बात पर बोली "लेकिन भैया भाभी का क्या"। इस बात पर कोमल की सासु माँ ने कहा "वो दोनों नही जा पाएँगे, शादी को अभी ज्यादा वक़्त नही हुआ है, और पहला सावन है साथ ही पता नही समीर को छुट्टी मिलेगी या नही, तो वो दोनों घर में ही रुकेंगे"।
रात को खाने की टेबल पर, दादी बस बार बार यही कह रही थी, "अरे वहाँ पर ठंड होगी, गर्म कपड़े रखलो वगैरह वगैरह"।
सासु माँ कीचन में आई तो कोमल ने उन्हें शुक्रिया कहा। वो बस मुस्कुरा के उसे देखने लगी।
अगले दिन घर के बाकी सदस्य कोमल और समीर को छोड़कर हरिद्वार के लिए निकल गए, उस शाम कोमल को समीर के ऑफिस से आने का बेसब्री से इंतज़ार था।
जब समीर आया तो उसके चेहरे पर खुशी के निशान कम और फिक्र की शिकन माथे पर ज़्यादा थी, ये देखकर बैग लेते हुए कोमल ने पूछा "आप परेशान है क्या बात हुई"।
जूते उतारते हुए समीर ने कहा "बॉस छुट्टी पर अपनी फैमली के साथ शिमला चला गया है, तो सारा काम मुझपर आ गया है, अगर ऑफिस न भी जाऊँ तो काम यहाँ लाकर करना पड़ेगा"।
समीर ये कहकर वाशरूम चला गया, पर कोमल खमोश खड़ी रही, इतनी मुश्किल से तो मौका आया था, क्या सावन बिना मन को भिगाये चला जायेगा।
अगली शाम,
आज दोपहर से ही आसमान पर बादलों का ढेरा आ लगा था, कोमल जब जब बाहर नज़र डालती तो उसका मन कहता, काश वो भी मनाली के किसी रिजॉर्ट में होती, काश वो आज इस तरह घर के कामों में और समीर लैपटॉप की स्क्रीन में काम न कर रहे होते। ऐसा उसने एक नज़र समीर को देखकर कहा जो स्टडी रूम की टेबल पर बैठे अपनी उंगलियों को लैपटॉप के कीबोर्ड पर दौड़ा रहे थे।
जाती शाम को रसोई घर की खिड़की से कोमल देख रही थी, कुछ नन्ही बूँदों का जमावड़ा भी अब शायद शुरू हो ही चुका था, पर कोमल अब तक रसोई घर में उलझी हुई थी।
कुछ ही पलो बाद कोमल के कानों में एक आवाज़ आई, जो बादलों की गड़गड़ाहट और बारिश की तेज गीरती बूँदों की आवाज़ थी, कोमल का दिल मचलने लगा।
उदास होकर कोमल बाल्कनी में चली आई और वहीं बैठ गयी, अपने हाथ पर हल्के मेहंदी के निशान को देखने लगी वो, टेढ़ी मेड़ी खूबसूरत आकृति बनी हुई थी उसकी हथेली पर।
उसने हथेली को आगे बढ़ा दिया तो सावन की कुछ बुँदे उसकी हथेली से टकराने लगी, कुछ बुँदे टकराकर छलक जातीं और कोमल के काजल लगी आँखों की पलकों पर आकर ठहर जाती।
अपने चेहरे पर बारिश की ठण्ठक और बूँदों की छुअन को महसूस करते हुए कोमल ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपने मन को खो जाने दिया इस सावन में।
स्टडी रूम से रसोई घर की तरफ जाते हुए समीर ने नज़रे दौड़ाकर कोमल को ढूंढा पर वो न दिखी, फ्रिज से पानी की बोतल लेकर लौटते हुए समीर की नज़र बाल्कनी पर जाकर ठहर सी गयी।
कोमल आँखें बंद किये वहीं बैठी थी, अपने हाथ को आगे बढ़ाए बहुत प्यारी लग रही थी वो समीर को। समीर अपने आप को उसके करीब ले जाने से रोक नही पाया, उस पर कोमल का सौंदर्य हावी था, और उसके चेहरे पर आकर ठहरी कुछ नन्ही बुँदो ने कोमल की खूबसूरती को हद से आगे बढ़ा दिया था।
न जाने कितने पलों तक समीर बस उसे देखता रहा, वो दोनों ही कहीं खोये हुए से थे, एक सावन में कहीं अपना मन भीगा देने को था तो एक आज किसी की मासूम खूबसूरती का कायल हो गया था।
अचानक से हुई बादलों की एक गरज ने इन दोनों को ही डरा सा दिया, कोमल ने एकदम से सहम कर अपने हाथ को खींच लिया और उसी तरह आराम से खड़े कोमल को देख रहे समीर को भी उस आवाज़ ने चोंका दिया था।
उसी पल कोमल की नज़र समीर पर गयी, उसे इस तरह डरा हुआ देखकर वो और समीर भी सहमी हुई कोमल को देखकर मुस्कुराने लगा।
दोनों ही अब एक दूसरे पर हँस रहे थे, हँसते हुए समीर वहीं कोमल के पास बैठ गया और कोमल से मज़ाक में बोला "अरे अभी तो बहुत अच्छा लग रहा था अब डर क्यों गई"।
ये सुनकर कोमल ने भी उसी तरह मज़ाक के लहज़े में कहा "आप भी नही डर गये थे अभी, जो मुझ पर हँस रहे हैं"। समीर ने झेंपते हुए कहा "नहीं ऐसा कुछ नहीं था, मैं नहीं डरता, तुमने देखा था क्या"।
कोमल समीर को देखने लगी और समीर की नज़र कोमल पर थी, दोनों एक दूसरे में न जाने क्या देख रहे थे।
तभी अचानक हुई एक ज़ोरदार बादलों की गरज ने इस बार दोनों को ही डरा दिया, कोमल सहमकर समीर के सीने से लग गयी और समीर ने भी अपने सहम जाने को छुपाते हुए कोमल को बाहों में भर लिया।
न जाने कब तक बूंदों का यूंही सिलसिला जारी रहा, और न जाने कितनी देर दोनों एक दूसरे को थामे वैसे ही बैठे रहे।
कोमल ने एक नज़र उठाकर समीर की तरफ देखा, फिर बाहर आए सावन को देखने लगी, समीर भी आज सावन में भीग गया था, दोनों का रिश्ता थोड़ा और मोहब्बत के धागे में बंधने लगा था अब।
दो दिनों बाद,
रसोई घर में गुनगुना रही अपनी भाभी को देखकर अदिति ने टाँग खिंचाई करते हुए कहा "अरे वाह भाभी, लगता है हमलोग के पीछे सावन आया था घर में"।
कोमल बस मुस्कान चेहरे पर लिए अपने काम में लगी रही, कुछ पलों बाद रसोई में कोमल सासु मॉं आईं तो कोमल उन्हें देखकर उनके गले से लग गयी।
इस तरह बहू को खुश देखकर उन्होंने कहा "अरे हनीमून तो नही जा पाए न तुम दोनों, तो फिर"। गले लगे हुए ही कोमल ने कहा "माँ इस बार सावन कुल्लु या मनाली में नहीं आया था, वो यहीं आया था"।
