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जिन्दगी एक डायरी

दूरदर्शन की यादें

ये वो दौर था जब बम खुद को शक्तिमान समझते थे। हालांकि उस समय का एक वही सीरियल था जिसका हम सुबह  से इंतज़ार किया करते थे।वो मंगलवार की शाम होती थी जब हम सब दोस्त मिलकर ऐसे दोस्त के यहाँ जाते थे जिसके घर पर टीवी हुआ करती।
वो मंगलवार की सुबह , स्कूल से आते ही 7 बजने का इंतज़ार करते ।
7 बजने से शायद 10 मिनट पहले शायद बहुत पहले , जो भी हो टाइम से पहले उसके घर पहुच जाते थे।

शक्तिमान का वो  टाइटल सांग शक्ति शक्ति शक्तिमान जिसको अक्सर अब भी गुनगुना लेता हूँ ।
बुधवार को जूनियर जी का इंतजार करना । वो भी 7 बजे ही आता था। उसका जी जैम जानी कह के जूनियर बन जाना। वो तौलिया बांध लें खुद को जूनियर जी कहना ओर सारी गलियों में ओर छत पर जी जैम जानी कह कर दुश्मनों को मारना।

उसके बाद आता गुरुवार इस दिन का कोई खासा इंतज़ार नही रहता था पर फिर भी देखने को जाते।
शाम को आता था चिट्ठी चित्रहार जिस पर नए गाने आते थे। 
मैं गाने कम डांस ज्यादा देखता था । 
ये उस दिन की बात है जब मैं दोस्त के घर गया था टीवी देखने हम सब मस्ती में चिट्ठी चित्रहार देख रहे थे और अचानक से दोस्त के पापा आये ।
उस दिन क्या हुआ था हमारे साथ वो हम ही जानते है।
हुआ यूं कि अंकल जी अचानक आ गए थे उस दिन ओर हम सब टीवी देख रहे थे ।

अंकल जी आये और आते ही साथ सबकी क्लास ले ली।
खैर उस दिन के बाद हमने दूसरे दोस्त के यहां टीवी देखने जाने लगे।
अब केवल मंगलवार और बुधवार को ही जाते पर कभी कभी शुक्रवार को भी चले जाते।
यू कहे कि रोज ही जाते।

दिन शुक्रवार जब चंद्रकांता आता था। उसकी स्टोरी भले आज तक समझ नही आई पर उसका टाइटल सांग जिसे सुनकर हम खुश हो लिया करते। 
उसका टाइटल सांग कुछ यूं हुआ करता था -चंद्रकांता की ये कहानी ....
उसके शुरू होते ही उसका टाइटल सांग ऐसे गाते थे जैसे राष्ट्रगान।
चंद्रकांता तो बस इसीलिए अच्छा लगता था क्योकि उसमे जादू होता था ।

दिन तो याद नही की किस दिन अलिफ लैला आता था ।
पर उसके टाइटल सांग को हमने कुछ यूं बनाया था जैसे टाइटल सांग लिखने वाले हम ही हो।
अलिफ लैला फटा थैला बजी पुंगी फटी लुंगी।
अक्सर हम इसे क्लास में मिलके गुनगुनाते रहते थे।
मुझे याद है वो दिन जब इस गाने की वजह से पूरी क्लास पिटी थी।

वो दुरदर्शन जिसने हमे दूर के दर्शन कराये।
खैर अब तो हम केबल वाले ओर डिश tv वाले बन गए।

एंटीना को चारों तरफ घुमा देना। कभी गुस्से में उसको इतना हिलाना की वो खुद कह देता था कि बस करो अब सही है हम। 

क्या थे वो दिन वो सफेद टीवी पर रंगीन सपने देखना।
वो सुबह से इंतज़ार करना । बस यूं ही खुश होते रहना।
खैर अब हम फिर से नही जी सकते वो दिन ।
फिर से एंटीना को  नही घुमा सकते।
फिर से दोस्त की माँ से नही सुन सकते कि तुम्हारी मम्मी बुला रही है।

अब वो टीवी भी नही, वो एंटीना भी नही।
याद आती है तो बस वो दूरदर्शन की tune