दूसरा पन्ना
Ek Letter Tumhare Liye
सुनो,
कैसी हो? आज सोचा तुम्हें एक चिट्ठी लिखूँ. पढ़ तो नहीं पाओगी इसे क्योंकि भेजूंगा नहीं तुम्हें कभी.
तुमसे अपनी मोहब्बत के तौर पर आखिरी बार 4 साल पहले मिले थे. पूरी शिद्दत से सीने से लगाया था उस दिन इस उम्मीद में की तुम्हारे दिल का जो बचा-कुचा हिस्सा मेरे सीने में नहीं है, वो भी मेरे सीने में आ जाये और मेरा दिल तुम्हारे सीने में चला जाए. मकसद था तुम्हें रोकने की एक आखिरी कोशिश. लेकिन तुम्हें जाना था और तुम शादी करने चली गयीं. और उस वाक्ये के बाद अब, एक साल पहले, तुमसे इन्टरनेट पर बात हुई. इन 4 सालों में मुझ पर क्या गुज़री अब उसका ज़िक्र बेईमानी होगा।
खैर, इस एक साल में जज़्बातों की अजब चाल देखने को मिली. तुम्हें फिर से पाने कि अजब सी तलब भी हुई. लेकिन फ़ौरन ये भी समझ आया की ऐसा हो नहीं सकता और न मैं ऐसा चाहता हूँ. और मुझे पूरा विश्वास था की तुम तो बिलकुल नहीं चाहोगी ऐसा.
लेकिन जब बातों का सिलसिला और बढ़ा तब एहसास हुआ की मैं तो पिछले 4 साल से खुद को धोखा दे रहा था।
जब साथ थे तुम्हारे तब तुम्हें समझने की कोशिश करी ही नहीं, क्यूंकि ज़रुरत नहीं हुई. आखिर तब तो ज़रुरत थी सिर्फ तुमसे मोहब्बत करना. और आखिर मोहब्बत में डूबे हुए इंसान को इतनी फुर्सत कहाँ की जान बचने वाली कश्ती की तलाश करे?
मोहब्बत तो वो दरिया होता है जिसे डूब कर ही पार करा जाता है. हम डूब गए और तुम तैर कर निकल गयीं.
और ये की तुमने वो दरिया तैर कर पार करा, इसका पता तो मुझे अब तुमसे बात कर के पता चला. अब तुम्हें समझने का मौका मिला. ये भी समझ आया की तुम क्यों कहती हो की तुम नहीं चाहती की कोई तुम्हें समझे. माना तुम नहीं चाहती की कोई तुम्हें समझे लेकिन समझने से रोक भी तो नहीं सकती. और शायद मैं काफी समझ गया हूँ तुम्हें।
तुमसे बात करके ये एहसास भी हुआ की जिसे मैंने मोहब्बत समझा और जिस मोहब्बत के खोने के ग़म को अपनी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा दिया, वो तो मोहब्बत थी ही नहीं। और मोहब्बत के नाम पर जो भी था, उसका तो तुम बड़ी आसानी से 4 साल पहले गला घोंट के चली गयीं थी। और उसे मारने के बाद फिर कभी पलट कर देखा भी नहीं की उस लाश का क्या हुआ जिसे सरेराह तुम छोड़ कर चली गयीं थी।
लेकिन अगर मोहब्बत नहीं थी तो फिर अब क्यूँ मिले? कोई तो वजह होगी जो तुम उस लाश को देखने के लिए पलट गयीं?
इस सवाल का जवाब है मेरे पास
ख़ुदा ने तुम्हें शायद इसी वजह से पलटने को मजबूर करा की मुझे पता चल पाए की जिस लाश को मैं आपने सीने में पाल रहा हूँ वो लाश तो मेरी मोहब्बत की है ही नहीं. ये लाश तो बस मेरी नादानी और मेरे नादाँ जज्बातों की है।
सच कह रहा हूँ, पहले मुझे भी नहीं समझ आया ये सब लेकिन अब तुमसे फिर से बात जब हुईं तब समझ आ गया है.
हमारे मिलने का मक़सद है उस लाश का अंतिम संस्कार करना। 4 साल से वो लाश अंतिम संस्कार के इंतज़ार में मेरे दिल में पड़ी हुई थी। मैंने बहुत बचाया उस लाश को ज़माने के भेड़ियों से जो मेरे पीछे पड़े रहे की मैं उन्हें उस लाश को नोचने दूं लेकिन मैंने लाश को बचाए रखा।
आखिर मेरे लिए वो लाश मेरी मोहब्बत की थी। और मैं तो उस लाश को ताउम्र बचाए रखता और अपनी लाश के साथ ही उसका अंतिम संस्कार होने देता लेकिन शायद ऊपर वाले को ये मंज़ूर नहीं था और उसने मुझे तुम्हें समझने का मौका दिया।
चलो वो अंतिम संस्कार भी कर दिया जाए। लो, मैंने तुम्हें आज़ाद करा. हो गया अंतिम संस्कार.
लेकिन इस लाश की आत्मा को शांति शायद कभी नहीं मिल पायेगी। सुनते हैं ऐसी मौत के बाद आत्मा भटकती है। शायद सही है। मेरे दिल में इस लाश की आत्मा भटकेगी। खैर, अब जो है सो है।
और हाँ, इस बात से बेफिक्र रहना की मैं कोई बद्दुआ दूंगा तुम्हें. मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा. गलती मेरी थी और रहेगी. मेरे समझने में ही फेर था।
घर में रहों। खुश रहों। सुरक्षित रहों।
