दूसरा पन्ना
हिसाब बराबर
आप समझते क्यों नहीं पिताजी.....
हमारा एक स्टेटस है, हमारे ओर आपके रहन-सहन में बहुत अंतर है..... मैं आपको ओर माँ को अपने साथ मुम्बई नहीं ले जा सकता। रोमा भी यही चाहती है कि आप दोनों यहीं रहें, उसे आप लोगों के साथ अनकंफर्टेबल लगता है।"
ये आवाज़ प्रताप जी के इकलौते बेटे सोमेश की थी जो अपने पिता को समझा रहा था.........समझा क्या रहा था फैसला सुना रहा था
सोमेश की माँ बोली " ठीक ही तो कह रहा है हम दोनों बुढ़े बुढ़िया कहाँ उनके जीवन मे खलल डालेंगे......नहीं शोभा !!!!!
उनकी बात बीच मे ही काटते हुए प्रताप जी चिल्लाये तुम्हारी तबियत ठीक नहीं रहती मुझे भी एक बार दिल का दौरा पड़ चुका है ......क्या इसीलिए इसे पाल- पोस कर बड़ा किया सारी जिंदगी की कमाई इसको काबिल बनाने में लगा दी ओर आज जब इसकी जरूरत है हमें तो ये अपनी पत्नी के साथ स्वतंत्र रहना चाहता है........कहते हुए लगभग रो पड़े प्रताप जी।
हाँ हाँ जनता हूं बहुत खर्चा हुआ आपका मुझे बड़ा करने में मुझे इस काबिल बनाने में सारा खर्चा दे दूंगा आपको.......
इस बार आवाज़ अपेक्षाकृत तेज़ थी उसकी वो ओर जोर से चिल्ला कर रोमा को आवाज़ देने लगा रोमा मेरा बैग लाओ ब्लैक वाला......रोमा जैसे इंतजार ही कर रही थी फटाफट बाहर आ गयीं बेग लेकर।।
सोमेश ने 20 लाख रुपये निकाले ओर प्रताप जी के हाथों में थमाता हुआ बोला......ये लीजिये पूरे 20 लाख हैं आपके हुए खर्च से कहीं ज्यादा ओर भी जरूरत पड़ी तो भिजवा दूँगा.....हिसाब बराबर!!!!!
ये सब देख रहा रोहन जो सिर्फ 7 साल का था सोमेश से बोला पापा मुझे भी बड़ा होकर बहुत बड़ा आदमी बनना होगा बहुत पैसे कमाने होंगे.........आखिर मुझे भी तो बड़े होकर आपका "हिसाब बराबर" करना होगा।
सोमेश फटी आँखों से उसे देख रहा था आखिर उसके बेटे ने उसे आईना जो दिखा दिया था......हिसाब बराबर का....
