दूसरा पन्ना
Preeti Ki Sikayat
प्रीति भूखी थी वो हलवाई के पास समोसा लेने पहुँची। हलवाई कई सौ बार जले हुए तेल में फिर समोसे डालने लगा तो प्रीति ने टोक दिया।
"भैया तेल तो बदल लो, कढ़ाई भी धोई है कि नहीं पता नहीं"
"देखो गुड़िया रानी, खाना है तो इही खाओ, ए कढ़ैया तुम्हार सिर नाही है जिसे सैम्पू से धोवें, अभी नरसों ही धोई है, समोसा खाओ, चटनी चाटो, हमारा सिर न खाओ, दिमाग न चाटो। चलो फूटो यहाँ से!"
प्रीति को बहुत गुस्सा आया "भैया मैं तुम्हारी शिकायत कर दूंगी अगर तेल न बदला तो,चलो बदलो"
"सिकायत करोगी? अब घुइयां न देंगे हम तुमको, जाओ सिकायत कल लो पहिले।"
"अच्छा नाराज़ न हो नहीं करेंगे, एक आलू का समोसा तो दे दो" प्रीति को भूख याद आई।
"आलू का छिलका तक नहीं देंगे तुम्हें, अब हिरन हो लो बता रहे हैं, दुड़की मारो चलो।"
प्रीति गुस्से में घर वापस आने लगी तो एक गड्ढे में गिर गई। उसके कपड़ों पर कीचड़ लग गयी। उसे और गुस्सा आया। "इस रोड कॉन्ट्रेक्टर की भी शिकायत करूंगी, इतनी खराब रोड बनाते है कि दो दिन में टूट जाती है।"
घर पहुँची ही थी कि दरवाज़ा खोलते ही बिजली का झटका खा गई। उसके बाल काकातुआ से खड़े हो गए।
वो खीज उठी।
पडोसी के अर्थ का एक तार टूटकर कई दिनों से उसकी छत की रेलिंग को छू रहा था। बारिश के मौसम ने करेंट उसके लोहे के दरवाज़े तक भी आ जाता था।
इसकी भी शिकायत करूंगी।
अपनी स्कूटी स्टार्ट करके वो किसी वकील के पास जाने लगी तो देखा जाम लगा हुआ है। वहीं पेड़ के नीचे ट्रैफिक पुलिस वाले चाय समोसे चबा रहे हैं, उसके मुँह में पानी आ गया।
उनके पास पहुँचकर लपलपाती बोली "साहब, इतना जाम लगा है, पहले इसे देख लेते, समोसे कहाँ भागे जा रहे हैं?"
"भागे न जा रे पर ठंडे तो हो रे हैं न? ठंडे समोसे कोण खाता है बता?"
बात ठीक थी, प्रीति की नज़र समोसों पर अटक गई।
"ओ बिटिया, नू गर्दन लम्बी करके मेरे संमोसों पे नज़र न मार, चल दफा हो वर्ना चालान काट दूंगा तेरा"
समोसे को घूरने पर भी कोई चालान था इसकी प्रीति को कोई जानकारी नहीं थी। वो कचहरी पहुँची।
उसे एक वकील मिला। उसको पूरी बात बताई "बिलकुल सही जगह आई हो बहन जी आप, सारा सिस्टम ही लधड़ गया है। आप बताइए किसपर केस करना है?"
"एक तो ट्रैफिक हवलदार पर, फिर रोड कांट्रेक्टर पर, फिर बिजली कंपनी पर, और पड़ोसी पर भी।"
"अरे हलवाई को भूल गई?"
"हाँ, उसपर भी।
"बहुत सही"
सारी शिकायतों के बाद वो तीन महीने तक कचहरी और वकील के चक्कर काटती रही।
इसमें उसके बीस हज़ार खर्च हुए और कॉलेज भी छोड़ना पड़ा।
फिर फ़ैसले के दिन वो ख़ुशी-ख़ुशी कोर्ट गई।
तीन दिन बाद -
"क्यों बिटिया क्या हुआ? क्या सीखा तूने?" एक अधमरी सी बुढ़िया जो उसके घर के पास ही रहती थी ने उससे पूछा।
"यही कि भूख लगे तो कुछ बना कर खा लो, या पानी पी के सो जाओ"
हाहाहाहाहा आस पास के कई लोग एक साथ हँसे।
उसे झूठा केस करने के जूर्म में ढाई हजार का जुर्माना देना पड़ा।।
