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जिन्दगी एक डायरी

बरसात और तुम्हारी यादें

बात बरसात की नही है...
ये तो बरसते ही रहेंगे मेरी आँखों की तरह...
लेकिन उन यादों का क्या करूँ जो थमती ही नही है कभी...
जब तुम्हारी साथ गुजारी बातें सोचता हूँ तो दर्द तो होता है लेकिन मीठा-मीठा सा...
जब सबकुछ सोचने के बाद  इस नतीजे पर पहुंचता हूँ कि *अब तुम नही हो* तो  गहरे दुख की मुद्रा पनप जाती है और आंखे पूर्णाहुति देने लगती है तब तुम्हारे प्रेमयज्ञ में...

आज भी मूसलाधार बरसात हो रही थी...
और मेरे अश्को की बारिशें उसे मुसलसल टक्करें दे रही थी....

लाख बारिशें है लेकिन जो ठंडक तुम्हारे साथ रहने से महसूस होती थी अब नही होती....

कोचिंग छूटते समय जब बारिश होने लगती थी...
तो हम लोग इंतजार करते थे कि कब बारिश खत्म हो और हम बिना भींगे घर तक पहुंच सके...


कोचिंग हाल के दरवाजे पर खड़े होकर बार बार बारिश की बूंदों को ताकती हुई तुम...
और बारिश कितनी हो रही है ये देखने के लिए हाथ का पैमाना  बढ़ाते हुए...जब तुम मुस्कुराती थी... और कहती थी ओह्ह अब भी बारिश हो रही है ...
तो फिर तिरछी नजर से हमे देखकर दूसरी तरफ मुंह करके हंस देती थी...
जो मेरी दिल की बंजर जमीन पर भी प्रेम उगा देता था...

हालांकि हम लोगो ने कभी बात भी नही की...
लेकिन तुम्हारी आदते और बातें मेरा दिल चुराने के लिए काफी थी...

जब बरसात खत्म हो जाती थी..
तो हम लोग घर की तरफ तेजी से भागने लगते थे...

तुम्हारी गली हमेशा बारिश होने के बाद पानी से  भर जाती थी...
और तुम संभल कर निकलने का प्रयास करती थी...
लेकिन जैसे ही तुम पानी से निकलती थी मैं तुम्हे भिगोने के लिए तेजी से पानी मे दौड़ता था  और सड़क पर भरे पानी के  छीटे तुम्हारे उपर पड़ते थे...
और थोड़े से गुस्से के साथ तुम मुस्कुरा देती थी...
हालांकि भीगते दोनों थे तुम सड़क में भरे पानी से,और मैं तुम्हारे मुस्कुराने की अदा से प्रेम में...
और तुम गुस्से से मुझे देखती तो थी...मगर मैं हंसता हुआ आगे बढ़ जाता था...
जब जब बारिश होती थी ये वाली हरकत करने से कभी नही चूकता था...

मुझे आज तक ये समझ नही आया कि बरसात में तुम्हारी गली  पानी से भरी रहती थी या प्रेम से...

खैर अब तो सब पत्थर का हो गया है...
तुम और तुम्हारी सड़क.....

एक मे प्रेम नही भरता और दूसरे में पानी....

पर ये समय है ना...
सबकुछ बदल देता है
पता ही नही चला क्या और कैसे हुआ
और कब गलतफहमियां बैठ गई तुम्हारे दिल मे मेरे लिए....
मैं समझ ही नही पाया कभी...
पता है चिढ़ होती है तुम्हे मेरे नाम से...
पता है तुम देखना भी नही चाहती हमे...
पता है कि तुम मेरे लिए बहुत बुरा भला कहती हो...
पता है मेरे लिए तुम्हारे दिल मे नफरत ही नफरत है...

पर मुझसे नफरत करने से पहले तुम्हे सुन लेनी चाहिए थी वो बातें
जो मैं तुमसे कभी कह ही नही पाया...

तुमने मुझे कभी कहने का मौका ही नही दिया...
जो भी जिसने कह दिया मान लिया तुमने...
मुझे आज भी इस बात का मलाल है कि मुझे तुमसे सब कह देना चाहिए था समय रहते...
पर वक्त पर न  कह पाई हर बात का मलाल तुम्हारे वियोग से ज्यादा दुख दे रहा है....

मैं तेरह साल से इसी इंतजार में हूँ...
कि कभी तो मेरा एकतरफा प्रेम दोतरफा प्रेम में बदलेगा....
पर वक्त की क्रूरता देखिए....
मैं तुमसे कभी कुछ कह ही नही पाया....
और तुम कभी खामोशियो को पढ़ नही सकी...
खैर हारे हुए प्रेमी के पास देने के लिए कुछ नही होता...
फिर भी तुम खुश रहो अपनी दुनिया मे इतना तो कह ही सकता हूँ.....

आज भी जब सोचने बैठता हूँ तो इस बात की बेचैनी मुझे तड़पाती रहती है कि 
आखिर क्या गलतफहमियां बैठ गई तुम्हारे दिल मे......
बेशक बुरा हूँ बहुत बुरा हूँ...
लेकिन तुम्हारे लिए तो नही हो सकता....
जब ये सोचते सोचते कि आखिर क्या गलती हुई मुझसे...
इस बात का दर्द जब मेरी आंखों तक आ जाता है...
तो एक शेर बहुत याद आता है 
बस यही एक गुनाह था मेरा मैं उसे सच मे प्यार करता था।