दूसरा पन्ना
बेजुबान हमें सुन सकते है ?
दीप्ति सब लड़कियों से अलग थी।साधारण सी दिखने वाली लड़की पर नैन नक्श बहुत सुन्दर। ज़्यादा किसी से बात नहीं करती थी। बस अपनी कल्पना में ही खोयी रहती थी। उसके मन में इतने विचार चलते थे। हर विचार में एक प्रश्न। उसके प्रश्नो का जवाब किसी के पास नहीं होता था। वह अपने आप ही जवाब ढूढ़ने लगती। माँ हमेशा कहती थी की इसका क्या होगा जब देखो तब पता नहीं क्या सोचती है, कहाँ गुम रहती है। दीप्ति अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाती थी। इस वजह से दीप्ति पढ़ाई में ज़्यादा अच्छी नहीं थी। उसके विचार दूसरों से बहुत अलग थे। अक्सर लड़कियों की कल्पना में कोई राजकुमार,कोई परी आदि जैसी सोच होती है पर उसकी कल्पना में पक्षी, प्रकृति होते थे। उसे पक्षियों से, प्रकृति से इतना लगाव था कि कई बार वह सुबह उठके प्रकृति से बातें करने लगती।
धीरे धीरे दीप्ति प्रकृति के इतने करीब हो गयी कि अपना सबसे ज़्यादा समय वो प्रकृति के करीब रह के बिताने लगी। दीप्ति पशु पक्षियों से बातें करना चाहती थी। कब उसकी इस कल्पना ने एक नया रूप ले लिए जब अचानक एक दिन कुछ अजीब हो गया। हुआ यह की दीप्ति मकान मालिक के कुत्ते(चेस्टर) से बहुत डरती थी। एक दिन वह जब बाजार से वापस आयी तो वहां गेट पे चेस्टर बैठा था। गेट बंद था और वहां कोई नहीं था। दीप्ति ने घंटी दबाई। कोई नहीं आया चेस्टर के अलावा। दीप्ति डर गयी। अब क्या करे क्या न करे। किसको बुलाये। अचानक उसने मन में कल्पना की कि यह चेस्टर यहाँ से चला जाए अंदर। और अचानक यह क्या चेस्टर अपने आप चुप चाप अंदर चला गया और तब तक बाहर नहीं आया जब तक दीप्ति चली नहीं गयी। दीप्ति को लगा यह कैसे हुआ। उसने ध्यान नहीं दिया। पर उसे लगा जैसे यह मेरे मन की बात पढ़ सकता है। उसने यह किसी को नहीं कहा नहीं तो सब उसका मज़ाक उड़ाते।
दीप्ति अक्सर ही चिड़ियों को जो भी खाती थी सबसे पहला रोटी का कौर और पानी चिड़ियों को डालती थी। पक्षी आधा खाते थे और आधा छोड़ के चले जाते थे। एक दिन माँ ने दीप्ति को डांट लगा दी की यह पक्षी कुछ नहीं खाते। ऐसे ही बेकार जाता है। कल से मत डालना खाना।
दीप्ति को गुस्सा आया और उसने रोटी के टुकड़े समेटते हुए उड़ते हुए पंछियों से कहा "ठीक है अब तुम लोगों ने नहीं ख़त्म किये यह रोटी के कौर तो तुम लोगों को अब कल से खाना नहीं डालूंगी , बैठे रहना फिर भूखे।" अगले दिन सुबह दीप्ति जब अपनी छत पे गयी तो वहां पूरा पंछियों वाला बर्तन खाली देखकर सोचने लगी "यह क्या कल तक तो इतने सारे टुकड़े पड़े थे आज कहाँ गए ?" उसने आस पास देखा की कहीं गिर तो नहीं गए वह रोटी के टुकड़े। पर सब जगह साफ़ थी। दीप्ति को बड़ा अच्छा लगा। दीप्ति एक दिन पानी रखना भूल गयी पंछियों के लिए तो एक मैना उसकी किचन की खिड़की पर आके बैठ गयी और चूँ चूँ करने लगी। दीप्ति को लगा जैसे मैना कह रही हो की आज पानी नहीं रखा मेरे लिए। दीप्ति ने दौड़ के पानी रख दिया और छुप के देखा तो वही मैना उसकी छत पे आके दीप्ति के रखे हुए जल से अपनी प्यास बुझा रही थी। दीप्ति अचानक से ही बोली "क्या यह सब मुझे सुन सकते हैं......." उसका इतना कहना था की सारे पेड़ पे बैठे पक्षी चूं चूं करने लगे ज़ोर ज़ोर से और उसके आस पास इकट्ठे हो गए। दीप्ति ने अपनी यह कल्पना की शक्ति पशु पक्षियों तक उनका संदेसा सुन्ने की और अपनी बात उनको बताने की जो उसके पास अनजाने ही आ गयी थी वो किसी को नहीं कहती थी। क्यूंकि उसे पता था लोगों को यह कोरी कल्पना ही लगेगी।
